आज अईसन दिन बछर आगे हे कि जन्मत बाढ़त लइका पिचका घलो मोबाइल मं चिपके हें। ओकर बिन लइका यदि रोवत हे तो मोबाइल ल धरा दे त चुप पर जावत हे। दाई बुता काज करत हे त धरा दे टॉम मन जेरी ल लगा दे तो भुलाय हे। अउ पाछू मोबाइल ल बरजे ल लइका उखर बिन नई रहय।मैं आप सब्बो ल पूछत हौ कि काबर लइका मोबाइल बिन रही।जब नान्हें पन ल मोबाइल ल धरा पाइधा डारेन।आज मोबाइल हमर समय बे समय काम अवइया साधन हे।ओमें सब्बो चीज मन ल देख सका थ। एक दूसर ल बतिया के बता सका थ।जतक आधुनिक विग्यान के बढ़ोतरी होत हे ओतेक हमन लइका मन ल दे आदत करात हन।का दाई ददा ल सोच नइ चाही कि हमर लइका ल कोन चीज ल देना हे कोन ओकर बर हानि हो ही। हमन नई देखन ओतेक बेरा फिर उही हमर काल बनत हे। जब जब लइका सोचें समझे लाइक होय तो ओला महंगा मोबाइल चाहिये। संसार के अउ कुछ चीज नई चाहिए लेकिन पहिली पराथमिकता मोबाइल होना हे।काबर कि हमन ल आसानी से सब संसाधन मिल सकत हे जेमा कच्छु बुद्धि लगाना हे नहीं। अईसन सोच ल तो हमन पहिली ल भर डारेन ह। तब लइका कइसन मानही।आज बाढ़त लइका मन ल उचित संस्कार, विचार दे के हमन करा समय नहीं ये।तब लइका कैसे संस्कारवान बनही।कैसे बुद्धि मिलहि ओला तो आसानी से गूगल में मिल जात हे।सोचे समझे के शक्ति घलो कमजोर बनात हन।जेकर परसाद हे जतेक टेक्नोलॉजी । मय टेक्नोलॉजी के विरोध नई करत हव बल्कि ये हमन के विकास के सोपान हे जोन समय के आधार पे बदलत रहिथे। बात हें बढ़त लइका ल समय मं संसाधन उपलब्ध कराय,संस्कार, विचार कराय के।आज लइका मन के याद छमता हँ कम होवत हे। काबर मोबाइल एकर परनाम हे जेकर बिन जिनगी के कल्पना करना अबिरथा हे।
लेख
कवि आनन्द सिंघनपुरी
रायगढ़
9993888747
